चिन्ता चिता से भी भयंकर होती है : मुनि पीयूष
करनाल, आशुतोष गौतम ( 8 जून ) उपप्रवर्तक श्री पीयूष मुनि जी महाराज ने श्री आत्म मनोहर जैन आराधना मन्दिर से अपने दैनिक सन्देश में कहा कि चिन्ता मन का भयंकर रोग है। चिन्ता के कारण मनुष्य के शरीर को मानो घुन लग जाता है और वह भीतर ही भीतर खोखला होता जाता है। किसी भी संकट की परिस्थिति का सामना होते ही चिन्ता अपना काम करने लग जाती है। चिन्ता के कारण हाथ-पैर कांपने लगते हैं, धड़कन बढ़ जाती है, खून सूखने लग जाता है, अनेक बीमारियां घेर लेती हैं और मनुष्य असमय ही मृत्यु का शिकार हो जाता है। चिन्ता चिता से भी भयंकर होती है क्योंकि वह सप्राण मानव को भी जला देती है जबकि चिता तो सिर्फ निष्प्राण देह को ही जलाती है। चिन्तित व्यक्ति का बल, बुद्धि और ज्ञान नष्ट हो जाता है। वह सदा चंचल, अशान्त तथा भयभीत रहता है। जिसके हृदय में चिन्ता जड़ जमा लेती है, उसके हृदय मे हीनता की भावना आ जाती है। उसका साहस जवाब दे जाता है और मुसीबतें विकराल रूप धारण कर लेती हैं। चिन्तातुर व्यक्ति का स्वास्थ्य भी गिरता जाता है। हमेशा चिन्तित रहने से गुर्दे की ग्रन्थियों से अत्यधिक मात्रा में एक द्रव्य निकलता है जो रक्त के साथ मिलकर उसे अशुद्ध बना देता है। चिन्ता से शरीर की चमक फीकी पड़ती है, त्वचा पीली पड़ जाती है, रक्तचाप बढ़ता है, मस्तिष्क में पीड़ा रहती है, पाचनतन्त्र गड़बड़ा जाता है और भोजन का पाचन ठीक ढंग से न होने के कारण अनेक बीमारियां पैदा हो जाती है। मुनि जी ने कहा कि चिन्ता की तीव्रता के कारण मनुष्य का दिमागी संतुलन बिगड़ जाता है और वह पागल भी हो सकता है। सट्टा करने वाले तथा भंडारण करने वाले चिन्ता के सागर में डुबकियां लगाते रहते हैं और हानि का परिणाम मिलते ही चिन्ता के कारण भूख-प्यास गायब हो जाती है, उत्साह मरा हुआ सा लगने लगता है तथा इच्छाशक्ति कमजोर होती है। जिसे धन की कमी होती है उसकी चिन्ताओं का कोई पार नहीं होता क्योंकि धन से ही जरूरतें पूरी होती हैं। यद्यपि चिन्ता करने से किसी समस्या का हल नहीं निकलता उल्टे उत्साह की कमी हो जाती है तथा स्वास्थ्य कमजोर होने लगता है। साथ ही यह संक्रामक रोग साबित होता है क्योंकि चिन्ताग्रसित व्यक्ति अपने आस-पास के वातावरण में चिन्ता के कीटाणुओं को फैला देता है। हमेशा चिन्तित रहने वाले व्यक्ति से कभी-कभी मित्रों तथा शुभचिन्तको को झुंझलाहट होने लगती है क्योंकि चिन्तातुर व्यक्ति की परेशानियों से सभी बचना चाहते है। मनुष्य को सोचना है कि चिन्ता मन का एक भयंकर रोग और सभी कठिनाईयों का मूल है। इसलिए विचार करें कि चिन्ता से लाभ कुछ नहीं, सिर्फ हानि ही हानि होती है।






























