करनाल, आशुतोष गौतम। भारत में जीएम(अनुवांसिक संशोधित बीज) बीजों का परीक्षण करने की केंद्र सरकार की ओर कतई इजाजत न दी जाए। इस आश्य को लेकर भारतीय किसान यूनियन के तत्वाधान में जिला उपायुक्त विनय प्रताप सिंह के माध्यम से मुख्यमंत्री मनोहर लाल के नाम ज्ञापन प्रेषित किया गया है। प्रदेश अध्यक्ष रतनमान ने उपायुक्त को ज्ञापन सौंपते हुए कहा कि अगर जीएम बीजों के परीक्षण पर बाहरी कंपनियों को इजाजत दे दी गई तो आने वाले समय में जलवायु व मानवीय जीवन पर विपरित असर ही नही पडेंगे बल्कि भारतीय खेती के उपर गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा। भारतीय कृषि की आजादी का हनन हो जाएगा। इतना ही नही भारतीय किसान इन कंपनियों का गुलाम बन कर रह जाएगा। क्योंकि दुनिया के दर्जनभर विकसित देश जीएम फसलों का उत्पादन करने से तौबा कर चुके है। अब ऐसी कंपनियों की भारत पर नजर है। मान ने कहा कि भारतीय किसान मानवता के हित में ऐसे परीक्षणों का जोरदार विरोध करेगा। इस मसले को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय किसान यूनियन खुली बहस करने के लिए चुनौती भी देती है। इससे पूर्व की भारत की सरकार इन बीजों के परीक्षण पर रोक भी लगा चुकी है।
प्रस्तुत ज्ञापन ‘भारतीय कृषि में बदलावÓ समिति की हाल में हुई बैठक से संबंधित है। उक्त बैठक में तिलहन फसलों खासकर तिलहन की खेती के लिए राज्य सरकारों से रायशुमारी की बात की गई है। यहां यह सोच काम कर रही है कि तिलहन की खेती से उत्पादन बढ़ेगा और आयात पर निर्भरता कम हो सकेगी। जबकि तिलहन फसलों के अब तक के अनुभव ठीक विपरीत कहानी बयां करती हैं। इस ज्ञापन के जरिए हम आपका ध्यान इस तरफ दिलाना चाहते हैं। तिलहन फसल उत्पादन में इजाफा लाने में असफल साबित हुए हैं। इनकी खेती के लिए अत्याधिक खाद और कीटनाशकों का प्रयोग करना पड़ता है। तिलहन उद्योग के खुद के आंकड़े बताते हैं कि तिलहन की खेती करने वाले 38 देशों में से 14 ने इसे अलविदा कर दिया है। इनमें ज़्यादातर विकसित देश हैं। उपज- 2004-05 तक कपास की खेती अच्छे से फली-फुली। लेकिन उसके बाद बी.टी बीज का इस्तेमाल बढ़ता गया। नतीजतन पिछले 15 साल के दौरान उसकी उपज में ठहराव सा आते देखने को मिला है। लेकिन तिलहन फसल के समर्थक इस हकीकत को जाहिर नहीं करते। हमें उम्मीद है कि आप लोगों को गुमराह होने से बचाने की दिशा में पहल करेंगे और समिति को बी.टी कपास की बजाय पारंपरिक कपास की खेती को प्रोत्साहित करने का निवेदन करेंगे। जिस बॉलवर्म से छुटकारा पाने के लिए बी.टी कपास पौधों की कोशिकाओं में बी.टी टॉक्सिन का उत्सर्जन होता है उसने प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली। किसान भी बी.टी कपास के विकल्प के बारे में सोचने लगे हैं। इसमें उन्हें सहयोग करने की जरूरत है। ऑफिसियल आंकड़े बताते हैं कि बी.टी कपास की खेती के लिए पहले से ज़्यादा खाद और कीटनाशक के प्रयोग की जरूरत पड़ गई। किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। 2014-15 के दौरान एक औसत कपास किसान को 6,318 रुपए प्रति हेक्टेयर का घाटा हुआ। कीटनाशकों और खादों के अधिक प्रयोग से जलवायु को भी नुकसान होता है।
तिलहन की खेती के मामले में शीर्ष पर स्थित अमेरिका और ब्राज़ील में भी यह पाया गया है कि कीटनाशकों के प्रयोग में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। कपास की उपज के लिहाज से भारत 35वें स्थान पर है। इसके ऊपर स्थित देशों में 24 ऐसे हैं जो तिलहन व कपास की खेती नहीं करते हैं। अमेरिका में भी पिछले 15 साल से होते आ रहे तिलहन बीजों के प्रयोग से उपज में कोई वृद्धि नहीं हुई। वास्तविकता तो यह है कि इन बीजों की तुलना में पारंपरिक बीज ही ज्यादा उपज देने वाले सिद्ध हुए हैं। तिलहन फसल के साथ जुड़े अन्य मुद्दे – भारत में बीटी कपास को बढ़ावा देने के क्रम में गैर-बीटी कपास कि़स्मों को नुकसान पहुंचाने के रिपोर्ट सामने आए हैं। इसके अलावा बी.टी किस्मों से गैर बी.टी कि़स्मों के संक्रमित होने का खतरा भी हर पल बना रहता है। शोध के दौरान जर्मप्लाज्म के बी.टी जीन से संक्रमित होने के मामले भी सामने आए हैं। इससे गैर बीटी कि़स्मों के विकास के रास्ते बंद होते हैं। इसलिए राज्यों को तिलहन फसलों के परीक्षण को खारिज करना चाहिए। अभी तो हम कपास, सोयाबीन और बैंगन की गैर कानूनी खेती को रोक नहीं पाए हैं। ऐसे में परीक्षण से होने वाले संक्रमण से कैसे पार पा सकेंगे। इससे हमारा निर्यात भी प्रभावित होता है। वर्ष 2012 में भारत के बासमती चावल के तिलहन व चावल से संक्रमित होने के आधार पर निर्यात पर रोक लगा दिया गया। तिलहन फसल के साथ जुड़े स्वास्थ्य और पर्यावरणीय मसलों के प्रति दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने ध्यान दिलाया है। जीएम तिलहन विकसित करने वालों के खुद अपने सुरक्षा संबंधित अध्ययन में बी.टी कपास के कारण व अन्य कारणों के साथ साथ गाय के दूध में कमी होने के संकेत मिले हैं। इसे फसल विकसित करने वालों के आंकड़ों के अवलोकन के लिए गठित सर्वोच्च न्यायालय तकनीकी विशेषज्ञ समिति के रिपोर्ट ने रेखांकित किया है। यही वजह है कि प्रमुख सूचना कमिश्नर के निर्देश के बावजूद 3 साल बाद भी तिलहन सरसों के जैवसुरक्षा अध्ययन को लोगों के लिए मुफ्त में उपलब्ध नहीं कराया गया है। संसदीय समिति ने भी तथष्ठ नियामकों के पालन में अनियमितता पाई और एक मत से तिलहन फसल से संबंधित नियमों को अधिक कठोर बनाने की बात की। दुनिया भर के 300 से ज़्यादा वैज्ञानिकों ने जीएम तिलहन फसलों की सुरक्षा पर कोई एक राय न होने संबंधी वक्तव्य जारी किया। मधुमक्खी पालकों ने भी बीटी कपास की खेती वाले इलाकों में मधुमक्खियों की संख्या में कमी आने की बात की है। तिलहन की आयात निर्भरता से उबरने के लिए – जहां तक तिलहन की बात है तो इसके उच्च उत्पादक देशों में से अधिकांश तिलहन बीज का प्रयोग नहीं करते हैं। जिस जीएम सरसों को इतना बढ़ चढ़कर पेश किया जा रहा है। उसका मौजूदा उच्च उत्पादकता वाले हाइब्रिड कि़स्मों की तुलना में परीक्षण भी नहीं किया गया है। आयात निर्भरता दूर करने के लिए तिलहन फसलों के आयात शुल्क को बढ़ाने की जरूरत है। इसके साथ ही किसानों से सरकारी खरीद का बंदोबस्त भी सुनिश्चित किया जाना ज़रूरी है। उपाय – भारत का उद्देश्य प्राकृतिक खेती का केंद्र बनना होना चाहिए। यह तिलहन से मुमकिन नहीं होने वाला है। कारण तिलहन और प्राकृतिक खेती के बीच छत्तीस का आंकड़ा है। दुनिया भर में यह पाया गया कि रासायानिक की जगह ऑर्गेनिक खेती शुरू करने के तीन से चार साल के भीतर ही उपज में बढ़ोतरी होने लगती है। बिहार, उड़ीसा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और झारखंड में किसानों ने टिकाऊ पारिस्थिकी अनुकूल खेती कर उत्पादन बढ़ाकर दिखा दिया है। भारत में 10 से ज्यादा राज्यों ने ऑरगेनिक खेती की राह पकड़ ली है। ऐसे में जीएम बीजों को बढ़ावा देना अनुचित होगा। ज्ञापन में मांग की गई है कि हम आशा करते हैं कि आप इन बातों का गंभीरता से संज्ञान लेंगे और जीएम फसलों के फील्ड परीक्षण या खेती को स्वीकृति नहीं देंगे। इस अवसर पर प्रदेश उपाध्यक्ष स. सुरेंद्र सिंह घुम्मन, प्रदेश संगठन सचिव श्याम सिंह मान, जिला सरंक्षण महताब कादिया, जिलाध्यक्ष यशपाल राणा, प्रवक्ता सुरेंद्र सागवान, प्रचार सचिव सुरेश कांबोज, नेकीराम, धनेतर राणा, विनोद राणा, दिलावर डबकोली, राजेंद्र राणा, सुनील नली सहित कई किसान मौजूद थे।






























