काम-भोग पतन के रसातल में पंहुचाते हैं: मुनि पीयूष
करनाल, आशुतोष गौतम ( 9 जून ) उपप्रवर्तक श्री पीयूष मुनि जी महाराज ने श्री आत्म मनोहर जैन आराधना मन्दिर से अपने दैनिक सन्देश में कहा कि मानव जीवन नियन्त्रित होना चाहिए। अनियन्त्रित जीवन में स्वाभाविक शक्तियों की प्रतिष्ठा नहीं हो सकती। काम-भोग मनुष्य को पतन के रास्ते पर धकेलते हैं तथा पतन के रसातल में पंहुचाते हैं। ब्रह्मचर्य जीवन वृक्ष का पुण्य है तथा प्रतिभा, प्रतिष्ठा, वीरता इसके कुछ फल हैं। ब्रह्मचर्य अमृत है। दैवी शक्तियां भी सदाचारी को नमस्कार करती हैं क्योंकि वह असम्भव को भी सम्भव करके दिखाता है। मूढ़-व्यक्ति काम-वासनाओ के चंगुल में फंसा रहता है। उसे हिताहित का विवेक नहीं रहता और वह मोह के पाश में फंसकर अपने जीवन को शक्तिशाली बनाने के स्थान पर बर्बाद कर देता है। मनुष्य का जीवन शक्ति उत्पादक डायनेमो की तरह होता है परन्तु उस शक्ति का अपव्यय न करके उसे संग्रहित कर उचित दिशा की ओर लगाने पर महान कार्य सम्पन्न किए जा सकते हैं परन्तु इस शक्ति-उत्पादक जीवन को काम-भोगों तथा विषय-वासनाओं के छिद्रों द्वारा नष्ट कर दिए जाने पर मनुष्य पराधीन, असहाय तथा निर्बल हो जाता है। शक्ति रूपी धन के न रहने पर जीवन थोथा हो जाता है। मुनि जी ने कहा कि काम-वासनाओं के कारण मन को शांति नहीं मिलती। कामी को उचित-अनुचित का कुछ भान नहीं रहता। सदा ही वह आकुल-व्याकुल रहता है और अनेकानेक अनर्थों में पड़ा रहता है। काम के विकार से मन चंचल और बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। कामी को भय तथा लज्जा नहीं रहती। वह समाज में निन्दनीय माने जाने वाले व्यवहार करता है। जिस मनुष्य का चरित्र उन्नत नहीं होता, वह सरकण्डे के पौधे की तरह हवा के वेग से सब ओर झुक जाता है। चरित्रहीन व्यक्ति मृतक की तरह होता है। उसके जीवन का कोई मूल्य नहीं होता। जिस तरह जल के बिना तालाब का, प्रकाश के बिना सूर्य का, तेल के बिना दीपक का और सुगंध के बिना पुष्प का कोई महत्त्व नहीं होता, इसी प्रकार चरित्र के बिना व्यक्ति का कोई मूल्य नहीं रहता। चरित्र में जीवन के सभी गुणों का समावेश हो जाता है। अहिंसा, मैत्री, दया, अनुकंपा, सत्य, निर्भयता, सन्तोष, ब्रह्मचर्य, सदाचार, तप, दान, ईमानदारी सभी चरित्र के अन्तर्गत आते हैं। मानव को अपने जीवन का निर्माण करते हुए चरित्र को उज्ज्वल बनाना चाहिए। सदाचारी व्यक्ति मर जाता है परन्तु उसके चरित्र की महक नहीं मिटती। सदा के लिए उसका चरित्र औरों के लिए प्रेरणा स्त्रोत बना रहता है। वह सभी के लिए आकर्षण का केन्द्र रहता है। सभी उसके पास बैठने, बातचीत तथा मित्रता करने के इच्छुक रहते हैं। इसके विपरीत दुराचारी सभी जगह तिरस्कार पाता है। उसे शंका तथा सन्देह की दृष्टि से देखा जाता है। वासनाओं का दास मोह तथा माया का शिकार बन जाता है। वासनारूपी नशे में व्यक्ति पथभ्रष्ट हो जाता है। वासनाओं की तृप्ति में अज्ञानी सुख मानता है जबकि सच्चा सुख आत्मा में होता है। इसलिए विषय-वासनाओं के चंगुल से निकल कर अपनी आत्मा में रमण करें।































