धन से ज्यादा से ज्यादा लोगों की जरूरतें पूरी करें : मुनि पीयूष
करनाल, 29 मई। (आशुतोष गौतम): श्री पीयूष मुनि जी ने श्री आत्म मनोहर जैन आराधना मन्दिर से अपने दैनिक सन्देश में कहा कि जनप्रिय बनने के लिए दानशीलता जरूरी है। दान का जीवन में बड़ा भारी महत्व है। दानी लोगों के हृदय में अपना स्थान बना लेता है। दान इस लोक में यश की प्राप्ति कराता है तथा परलोक में भी उत्तम फल देता है। धन-दौलत से आत्मा का कुछ भी कल्याण नहीं होता, यक्ष की तरह उसकी सुरक्षा में सारा दिन लगा देने पर अन्त में एक पाई भी साथ नहीं जाती। सारी दौलत आंख मुंदते ही पराई हो जाती है। धन की बदौलत व्यक्ति सुख पाना चाहता है परन्तु उसे न लोक में सुख मिलता है और न परलोक में। निन्यानवै के फेर में पड़ा हुआ व्यक्ति परिग्रह संग्रह का पाप करके भी रुकता नहीं, बल्कि आगे और भी भयंकर पाप करता चला जाता है। वह नए-नए अत्याचारों को जन्म देता है तथा लाखों लोगों को शीत से ठिठुरते और भूख से मरते हुए देखता है। परिग्रहबुद्धि से क्रूरता का भाव बढ़ता है तथा यदि उसे नियंत्रण में न किया जाए तो मनुष्य पिशाच बन जाता है। इस लोक में कभी धन के चोरी हो जाने पर, व्यापार में धक्का लगने से, दिवाला निकलने से अथवा किसी के द्वारा धोखेबाजी से हरण कर लेने पर धनवान व्यक्ति सिर पर हाथ धरकर रोता है और अगर पुण्य के प्रभाव से ऐसी विकट स्थितियां न भी आएं तो किसी भी वक्त यमराज के निमन्त्रण से सब कुछ छोड़ कर चलना पड़ता है। उस वक्त एक कौड़ी भी साथ नहीं जाती, खाली हाथों से ही यहां से प्रयाण करना पड़ता है। धन तथा तन दोनों क्षणिक हैं।






























