नीट-जेईई के नाम पर डेढ़ से दो लाख तक की फीस! चमकदार विज्ञापनों में सफलता के बड़े-बड़े दावे, लेकिन असफल बच्चों और उनके परिवारों का हिसाब कौन देगा?—कोचिंग कारोबार पर उठे गंभीर सवाल
बीएचटी न्यूज, ऊना। ऊना में नीट और जेईई जैसी कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के नाम पर तेजी से फैल रहे कोचिंग कारोबार ने अब शिक्षा से कहीं बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या बच्चों के भविष्य को संवारने के नाम पर उनके सपनों की ‘बिक्री’ हो रही है? मोटी फीस, सफलता के बड़े-बड़े दावे और चमकदार प्रचार के बीच उन बच्चों और अभिभावकों की आवाज दबती नजर आती है, जो भारी रकम खर्च करने के बाद भी सफलता की मंजिल तक नहीं पहुंच पाते।डेढ़ से दो लाख रुपये फीस… और बदले में सपनों की गारंटी भी नहीं! यही वह तस्वीर है, जो कई मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए चिंता का कारण बन रही है। बच्चे को डॉक्टर या इंजीनियर बनाने की चाह में अभिभावक अपनी वर्षों की बचत दांव पर लगा रहे हैं। कुछ परिवार तो बच्चों की पढ़ाई का खर्च जुटाने के लिए गहने बेचने तक की मजबूरी बयां करते हैं। सवाल है—क्या किसी बच्चे के भविष्य की कीमत इतनी होनी चाहिए कि परिवार की आर्थिक रीढ़ ही टूट जाए?कोचिंग संस्थानों के विज्ञापनों में टॉप रैंक, चयनित विद्यार्थियों और सफलता के बड़े-बड़े दावे दिखाई देते हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि इन दावों के पीछे पूरी तस्वीर कहां है? किसी संस्थान में कुल कितने विद्यार्थियों ने दाखिला लिया? कितने परीक्षा में बैठे? कितने सफल हुए और कितने असफल? क्या यह पूरा आंकड़ा अभिभावकों के सामने रखा जाता है?अगर नहीं, तो फिर कुछ सफल चेहरों को सामने रखकर बाकी बच्चों की असफलता को पर्दे के पीछे क्यों रखा जाता है?यही वह बिंदु है जहां कोचिंग कारोबार की पारदर्शिता पर सवाल खड़े होते हैं। अभिभावक विज्ञापन देखकर प्रभावित होते हैं, भारी फीस जमा करवाते हैं और बच्चे दिन-रात पढ़ाई में जुट जाते हैं। लेकिन परीक्षा परिणाम आने के बाद जब उम्मीदें टूटती हैं तो परिवार के सामने सिर्फ असफलता नहीं होती—उसके साथ लाखों रुपये का आर्थिक बोझ, बच्चे के भविष्य की चिंता और सामाजिक दबाव भी खड़ा होता है।सबसे ज्यादा कीमत बच्चा चुकाता है। महीनों और वर्षों की तैयारी, लगातार टेस्ट, प्रतिस्पर्धा और परिवार की उम्मीदों के बीच परीक्षा में अपेक्षित परिणाम न आने पर कई बच्चे गहरे मानसिक दबाव में जा सकते हैं। ऐसे समय में उनसे केवल यह कहना कि “अगली बार मेहनत करो”, समस्या का समाधान नहीं है। उनके पीछे खड़े परिवार की आर्थिक और भावनात्मक स्थिति को भी समझना जरूरी है।और यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—फीस लेने वाले संस्थान की जिम्मेदारी सिर्फ फीस की रसीद काटने तक है या बच्चों के भविष्य के प्रति भी कोई जवाबदेही है?यह भी स्पष्ट है कि कोई कोचिंग संस्थान हर बच्चे की सफलता की गारंटी नहीं दे सकता। प्रतियोगी परीक्षाएं स्वभावतः प्रतिस्पर्धात्मक हैं और हर विद्यार्थी का चयन संभव नहीं। लेकिन यदि सफलता को प्रचार का हथियार बनाकर भारी फीस वसूली जाती है, तो परिणामों की पूरी और वास्तविक तस्वीर सामने रखना भी जरूरी है। वहीं कोचिंग सेंटरों को यह भी समय रहते बताया जाना चाहिए कि कौन सा बच्चा कितने सालों में इस परीक्षा को उत्तीर्ण कर सकता है ताकि अभिभावक भी किसी गलतफहमी का शिकार ना हों। अगर कोई बच्चा पहले साल सफल नही हो पाता है तो उसको आगे के लिए फीस के मामले में रिलेक्सेशन मिलना चाहिए। अब ऊना प्रशासन और संबंधित विभाग को इस मामले में केवल दर्शक बने रहने के बजाय सवाल पूछने चाहिए। कोचिंग सेंटरों की फीस कितनी है? किस आधार पर तय होती है? प्रचार में किए जा रहे सफलता के दावों की वास्तविकता क्या है? कितने विद्यार्थियों ने दाखिला लिया और कितनों का चयन हुआ? क्या अभिभावकों को फीस और सुविधाओं की पूरी जानकारी दी जाती है?इन सवालों के जवाब सामने आने चाहिए।क्योंकि शिक्षा कोई मंडी नहीं, जहां बच्चों के सपनों की बोली लगे। अभिभावक ग्राहक नहीं और उनके बच्चे किसी कोचिंग सेंटर के ‘सफलता प्रतिशत’ को चमकाने का आंकड़ा नहीं हैं।ऊना में कोचिंग संस्थानों का होना गलत नहीं है। गुणवत्तापूर्ण कोचिंग बच्चों के लिए मददगार भी हो सकती है। लेकिन यदि कहीं शिक्षा की आड़ में अभिभावकों की मजबूरी को कमाई का अवसर और बच्चों के सपनों को बाजार का उत्पाद बनाया जा रहा है, तो यह सिर्फ व्यापार का मामला नहीं—यह सामाजिक चिंता का विषय है।अब ऊना के अभिभावकों को भी सवाल पूछना होगा और प्रशासन को भी जवाब मांगना होगा।कितनी फीस ली? कितने बच्चे पढ़े? कितने सफल हुए? कितने असफल हुए? और सफलता के बड़े-बड़े दावों के पीछे की पूरी सच्चाई क्या है?क्योंकि सवाल सिर्फ उन बच्चों का नहीं जो डॉक्टर या इंजीनियर बन गए। सवाल उन सैकड़ों बच्चों का भी है, जिनके परिवारों ने लाखों रुपये खर्च किए, उम्मीदें लगाईं और अंत में हाथ लगी सिर्फ निराशा। सपनों की कीमत वसूलने वालों से अब हिसाब मांगने का समय है—शिक्षा चाहिए, ‘सपनों की दुकान’ नहीं।






























