करवाचौथ या वोटों का कारोबार ?
चुनावी साल में ही क्यों जागा नेताओं का महिला प्रेम! ₹50 की फेनियां और मुफ्त साड़ियों से महिलाओं को लुभाने की कोशिश पर उठे सवाल
डॉ रणधीर जसवाल, ऊना चुनाव नजदीक आते ही नेताओं का महिला प्रेम अचानक उमड़ने लगा है। करवाचौथ के नाम पर कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं, महिलाओं को फेनियां बांटी जा रही हैं और मुफ्त साड़ियां देकर उन्हें समागमों में बुलाया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि महिलाओं के प्रति यह प्रेम पिछले तीन-चार वर्षों तक कहां छिपा था? क्या महिलाओं का सम्मान केवल चुनावी साल में ही याद आता है?क्या महिलाओं का सम्मान ₹50 की फेनियों और मुफ्त साड़ियों तक सीमित रह गया है?करवाचौथ जैसे पवित्र त्योहार को लेकर आयोजित कार्यक्रमों पर सवाल उठाना किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं, बल्कि त्योहारों के नाम पर होने वाली राजनीति पर विचार करना है। सामाजिक आयोजन होना अच्छी बात है, लेकिन यदि इन आयोजनों के पीछे चुनावी लाभ हासिल करने का उद्देश्य है, तो जनता को सवाल पूछने का पूरा अधिकार है।आखिर नेताओं को अचानक महिलाओं की इतनी चिंता क्यों सताने लगी? जो नेता वर्षों तक महिलाओं के लिए ऐसे कार्यक्रम आयोजित करने से दूर रहे, वे चुनावी वर्ष में एकाएक इतने सक्रिय कैसे हो गए? इन आयोजनों पर खर्च होने वाला पैसा कहां से आ रहा है और क्या इनका उद्देश्य वास्तविक महिला सशक्तीकरण है या चुनाव से पहले राजनीतिक समर्थन जुटाना?महिलाएं वोट बैंक नहीं, समाज की मजबूत आधारशिला हैं।महिलाओं के सम्मान का अर्थ उन्हें कुछ रुपये की फेनियां या मुफ्त साड़ी देना भर नहीं हो सकता। वास्तविक सम्मान तब होगा, जब उन्हें बेहतर शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और आर्थिक आत्मनिर्भरता के अवसर मिलेंगे। महिलाओं को राजनीतिक मंचों पर बुलाकर उपहार बांटना आसान है, लेकिन उनके जीवन की वास्तविक समस्याओं का समाधान करना कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।समाज के सामने एक और गंभीर सवाल है। क्या हम मुफ्त उपहारों के आकर्षण में इतने उलझते जा रहे हैं कि आयोजनों के उद्देश्य पर सवाल पूछना ही छोड़ दिया है? किसी महिला का सामाजिक कार्यक्रम में शामिल होना या उपहार स्वीकार करना गलत नहीं है। हर महिला को अपनी पसंद से निर्णय लेने का अधिकार है। लेकिन यह भी जरूरी है कि किसी के स्वाभिमान और मत की कीमत उपहारों से तय करने की कोशिश न हो।करवाचौथ पति-पत्नी के प्रेम, विश्वास और समर्पण का पर्व है, चुनावी प्रचार का माध्यम नहीं।इस त्योहार पर विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुखमय जीवन की कामना करती हैं। परिवारों में इस पर्व से जुड़ी परंपराएं पीढ़ियों से निभाई जाती रही हैं। कई परिवारों में पति अपनी मेहनत की कमाई से पत्नी के लिए उपहार खरीदते हैं। यह केवल उपहार का मामला नहीं, बल्कि आपसी प्रेम और रिश्तों की भावनात्मक अभिव्यक्ति है।ऐसे में यह विचार करना जरूरी है कि क्या हमारे पारंपरिक त्योहारों को राजनीतिक प्रचार का माध्यम बनाया जाना चाहिए? क्या सामाजिक आयोजनों की आड़ में चुनावी समीकरण साधने की कोशिश हो रही है? यदि आयोजनों का उद्देश्य वास्तव में महिलाओं के प्रति सम्मान और सामाजिक एकजुटता है, तो फिर यह पहल चुनावी वर्ष में क्यों नहीं दिखाई देती?यह भी ध्यान रखना होगा कि केवल चुनावी वर्ष में आयोजन होने से किसी नेता की मंशा अपने आप साबित नहीं हो जाती। लेकिन आयोजनों की संख्या, उनके खर्च, उनकी निरंतरता और महिलाओं के लिए किए गए वास्तविक कार्यों के आधार पर सवाल उठाना लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है।नेताओं से पांच सीधे सवाल1. महिलाओं के लिए ऐसे कार्यक्रम पिछले तीन-चार वर्षों में क्यों नहीं किए गए?2. चुनावी वर्ष में ही महिलाओं के प्रति यह विशेष लगाव क्यों दिखाई देने लगा?3. इन कार्यक्रमों पर खर्च होने वाले धन का स्रोत क्या है?4. महिलाओं के वास्तविक सशक्तीकरण के लिए शिक्षा, रोजगार और सुरक्षा के क्षेत्र में क्या ठोस काम किए गए हैं?5. क्या इन आयोजनों का उद्देश्य सामाजिक सेवा है, या इनके माध्यम से चुनाव से पहले राजनीतिक समर्थन जुटाने की कोशिश की जा रही है?इन सवालों के जवाब मिलना जरूरी है। महिलाओं को भी यह समझने का पूरा अधिकार है कि उनके नाम पर आयोजित कार्यक्रमों का उद्देश्य क्या है और उनसे समाज को वास्तविक लाभ कितना मिल रहा है।समाज को भी आत्ममंथन करना होगात्योहार हमारी संस्कृति और परंपराओं की पहचान हैं। उनकी गरिमा बनाए रखना केवल नेताओं की नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है। किसी महिला को उपहार स्वीकार करने या किसी कार्यक्रम में जाने के लिए दोषी ठहराना उचित नहीं, लेकिन उपहारों के आधार पर महिलाओं के सम्मान या उनके मत का मूल्यांकन करना भी गलत है।राजनीतिक नेताओं को चाहिए कि वे महिलाओं का सम्मान केवल चुनावी वर्ष में नहीं, बल्कि अपने निरंतर कार्यों से साबित करें। वहीं, समाज को भी चाहिए कि वह किसी आयोजन के आकर्षण से प्रभावित होने के बजाय उसके उद्देश्य, खर्च और परिणामों पर सवाल पूछे।अंतिम सवाल यही है—क्या करवाचौथ की पवित्रता और महिलाओं के सम्मान को राजनीतिक लाभ से ऊपर रखा जाएगा, या त्योहारों को भी चुनावी समीकरणों का हिस्सा बनने दिया जाएगा?महिलाओं का सम्मान किसी नेता की कृपा नहीं, उनका अधिकार है। त्योहारों की गरिमा बनाए रखना, राजनीतिक आयोजनों में पारदर्शिता की मांग करना और महिलाओं को अपने विवेक से निर्णय लेने देना ही एक जागरूक समाज की पहचान है।




























