सुख दुख में अन्तर का कारण कर्म है-मुनि पीयूष
करनाल, आशुतोष गौतम। उपप्रवर्तक श्री पीयूष मुनि जी महाराज ने श्री आत्म मनोहर जैन आराधना मन्दिर से पर्युषण पर्व के अंतर्गत अन्तगढ़ सूत्र में वर्णित गजसुकुमार के प्रसंग के आधार पर कहा कि कर्म गति टारी नहीं टरै। जीवन में कर्म की प्रधानता है। संसार का प्रत्येक प्राणी सुख और दुख के झूले में झूलता रहता है। उसके जीवन में कभी सुख तो कभी दुख रथ के चक्र की नेमियों की तरह आता-जाता रहता है। आखिर इसका कोई न कोई कारण तो होना ही चाहिए जबकि प्रत्येक प्राणी सदैव दुख से दूर रहने और अपने जीवन में सुख की शीतल छाया के स्वप्न देखता रहता है। मनुष्य चाहता कुछ है और हो कुछ और जाता है। परमात्मा सबका परम पिता है जो किसी को दुख नहीं देता परन्तु जीव जब कर्म ही खराब कर लेता है तो वह भी उसके फल से उसे बच नहीं सकता। प्रकृति जड़ है। जीवों के सुख-दुख में अन्तर का कारण उसका अपना ही किया हुआ कर्म है। भारतीय संस्कृति में कर्म का महत्त्वपूर्ण स्थान है। सभी आसीतक दर्शन कर्म को मानते हैं। कर्मों की परम्परा अनादि काल से चल रही है और कर्म फल देने के बाद ही आत्मा से अलग होता है। कर्म किसी का सगा नहीं है। इसका फल राजा-रंक, गृहस्थ-संन्यासी को भी भोगना पड़ता है। सारा संसार कर्मों के अधीन है। जो बोया जाता है, वैसी ही फसल मिलती है। हाथों से दी हुई गांठें दांतो से खोलने पर भी नहीं खुल पातीं। करोड़ों कल्प बीत जाने पर भी कर्म फल दिए बिना नहीं छोड़ता। जैसे बछड़ा हजार गायों में अपनी मां को पहचान लेता है, इसी प्रकार कर्म करके जीव जहां मर्जी चला जाए उसका कर्म उसे पहचान लेता है। कर्म करके जीव कैसा भी वेश बना ले परन्तु कर्म उसे छोड़ता नहीं। वैद्य कफ, पित्त और वायु का विकार बताते हैं, ज्योतिषी ग्रहों का प्रकोप तथा भूतवादी भूतों की नाराजगी को व्यक्ति की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं परन्तु ज्ञानी जन पुराने किए कर्मों को सर्वाधिक बलवान बताते हैं। मुनि जी ने कहा कि कर्म पर विश्वास न होने से सारी भटकन होती है। भटकने से अशांति बढ़ जाती है। कर्म साम्राज्य में कोई किसी की मदद नहीं कर सकता। कर्म सिद्धान्त पर आस्था होने से शांति मिलती है। कर्म का पत्र अपने हाथ से जैसा लिखा जाता है, वैसा ही स्वयं को प्राप्त होता है। दुनिया की आंखों में धूल झोंकी जा सकती है परन्तु कर्म को धोखा नहीं दिया जा सकता। कर्म का सुदर्शन चक्र चलने पर मित्र भी शत्रु में परिवर्तित हो जाता है तथा जिस पर उपकार किया जाता है, वह भी जड़े खोदने लगता है। कर्म करते समय भाव कुछ होता है तथा भोगते समय कुछ और। हंसते-हंसते कर्म किया जाता है परन्तु रोते-रोते उसका फल भोगे भी नहीं बनता। भविष्य में रोना न पड़े। इसका विचार करके कर्म करना चाहिए। कर्म के लेख को कोई मिटा नहीं सकता। कर्म की गति अति गहन है। कर्म मदारी जीव रूपी बन्दर को नचाया करता है। कर्म के आगे पोथी, पतरे, पञ्चाङ्ग फेल हो जाते हैं तथा ऋषि-मुनि हार जाते हैं। बड़े-बड़े महापुरुष भी कर्म की छाया से बच नहीं पाते। शुभ कर्मों का फल शुभ तथा अशुभ का फल बुरे रूप में जीवन में आता है। राजा सगर के साठ हजार पुत्र एक बार में ही समाप्त हुए, सनत्कुमार चक्रवर्ती सात सौ वर्षों तक बीमारियों से पीड़ित रहा, भगवान राम का वनवास हुआ जो कर्मों का ही खेल था। इसलिए सोच-समझकर कर्म करना चाहिए। आज कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी पर श्रद्धालु संगम हुआ। जिसमें श्रद्धालुओं ने भजन-कीर्तन कर श्री घंटाकर्ण महावीर देव की स्तुति की।































