पराक्रम के बिना व्यक्ति की बुद्धि निष्फल चली जाती है : मुनि पीयूष
करनाल, आशुतोष गौतम ( 16 जून ) उपप्रवर्तक श्री पीयूष मुनि जी महाराज ने श्री आत्म मनोहर जैन आराधना मन्दिर से अपने दैनिक सन्देश में कहा कि बुद्धि श्रद्धा संपन्न तथा विकारों की मलिनता से रहित होने पर ही उन्नति का एक मजबूत स्तम्भ साबित होती है। बुद्धि के बिना सिर्फ बल से कोई काम सिद्ध नहीं होता। जिसके पास बुद्धि होती है, उसके पास ही बल होता है। बुद्धिमान प्रत्येक कठिनाई में से सहज ही निकल जाता है। उसकी चतुराई हर परिस्थिति में अपना मार्ग खुद खोज लेती है। बुद्धिमान के लिए इस लोक में कुछ भी असंभव नहीं है। बुद्धि का साथ होने पर कुछ भी असाध्य नहीं रहता। बुद्धिहीन संसार के सर्वोत्तम साधनों से लाभ नहीं उठा सकता। मुनि जी ने कहा कि बुद्धि और विवेक के बिना ज्ञान, तप के द्वारा शरीर को कष्ट देकर भी मुक्ति नहीं पाई जा सकती तथा न ही पुस्तकों का भण्डार सामने होने पर लाभ उठाया जा सकता है। बुद्धि के न होने पर व्यक्ति कदम-कदम पर मुसीबतों में फंस जाता है तथा कभी-कभी तो जीवन से भी हाथ धो बैठता है। बुद्धि की स्थिरता के बिना काम सिद्ध नहीं होता। मनुष्य के पास बुद्धि का होना सर्वश्रेष्ठ बल का होना है। बुद्धि के बिना व्यक्ति को बिना सींग तथा पूंछ के पशु जैसा समझना चाहिए। बुद्धि दैवी विभूतियों में उच्च कोटि का वरदान है। मूर्ख छोटा सा काम शुरू कर उससे व्याकुल हो जाते हैं और नाकाम होते हैं। बुद्धिमान बड़े से बड़ा काम आरम्भ कर भी निश्चिंत बने रहते हैं तथा सफलता प्राप्त करते हैं। साधना के क्षेत्र में नादान अनेकानेक कष्ट सहकर भी शुभ फल नहीं पाते किन्तु बुद्धिमान सारी तकलीफों पर विजय प्राप्त कर भवभ्रमण से दूर जाते हैं।































