क्रोध मानव का सबसे बड़ा शत्रु है – मुनि पीयूष
करनाल, आशुतोष गौतम। उपप्रवर्तक श्री पीयूष मुनि जी महाराज ने श्री आत्म मनोहर जैन आराधना मंदिर करनाल से अपने दैनिक संदेश में कहा कि क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। मनुष्य जिन व्यक्तियों या वस्तुओं की वजह से क्रोध करता है, उनकी अपेक्षा क्रोध अधिक हानि करता है। क्रोध के कारण मनुष्य के अन्त:करण में जहरीला कांटा चुभ जाता है जो निकलने का नाम नहीं लेता। मधुमक्खी के डंक से थोड़े समय तक पीड़ा होती है परन्तु क्रोध करने की पीड़ा अनन्त काल तक बनी रहती है। क्रोध में व्यक्ति अन्य दुर्गुणों को अपने जीवन में आकर्षित करता है जैसे चुगलखोरी, दुस्साहस, ईर्ष्या, जलन, दूसरों के गुणों में दोषदर्शन, अयोग्य धन का लेन-देन, कड़वी वाणी तथा कटु व्यवहार। शरीर के अतिरिक्त मन पर भी क्रोध का भयंकर प्रभाव पड़ता है। क्रोधी क्षण-क्षण में मन में जलता रहता है। जब क्रोध आता है तो व्यक्ति की विवेक बुद्धि अपनी तथा दूसरों की हानि सोचने में लुप्त हो जाती है। उसको सदविचार नहीं होता। अपनी हानि पर उसे तरस नहीं आता। कुछ भी हो किसी भी तरह क्रोधी व्यक्ति अपना व्यसन पूरा किए बिना नहीं हटता। उसकी जिद्द पूरी होनी ही चाहिए। अधिक क्रोध करने से मस्तिष्क में रहे ज्ञानतन्तु नष्ट हो जाते हैं। परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने वाले अधिकांश विद्यार्थी क्रोध के कारण हमेशा उत्तेजना में रहते हैं और तन्मयतापूर्वक पढ़ नहीं पाते। मुनि जी ने कहा कि निश्चित रूप से क्रोधी व्यक्ति को संसार में सुख नहीं मिलता। वह अपनी वाणी और व्यवहार की कटुता के कारण अपने दुश्मन बढ़ा लेता है। क्रोधी व्यक्ति अपनी या दूसरों की स्थिति के बारे में गलत धारणा बना लेता है और उसे कुछ का कुछ दिखाई देता है। दुर्वचन, स्वार्थपूर्ति में अड़चन, अनुचित व्यवहार, गलत धारणा तथा रुचि और विचार का भेद क्रोध पैदा करते हैं। क्रोध वैर बढ़ाता है, मित्रता मिटाता है, रूप को विरूप बनाता है, निन्दनीय बुद्धि बढ़ाता है, दुर्भाग्य लाता है, यश को समाप्त करता है। क्रोध सबसे बड़ा दुश्मन है जो व्यक्ति का सर्वनाश करता है। क्रोध क्रूरता, पैशाचिकता को स्वयं में समेटे रहता है। क्रोध में निर्माण नहीं बल्कि विनाश का भाव रहता है। क्रोध में हमेशा तोड़-फोड़, मार-पीट और गाली-गलौच के भाव रहते हैं। क्रोध प्रेम को समाप्त करता है। क्रोधी किसी को भी प्यारा नहीं लगता। क्रोध में अन्धा व्यक्ति सारे पाप कर बैठता है। क्रोध समझदारी को बाहर निकालकर बुद्धि के दरवाजे को चिटकनी लगा देता है। क्रोधी व्यक्ति सभी जगह तिरस्कार तथा अपमान पाता है। कोई भी उसे आदर नहीं देता। सभी उसके सम्पर्क से बचना चाहते हैं। पागल कुत्ते के समान दशा क्रोधी की होती है। जिस तरह पागल कुत्ता चोर और साहूकार को न देखकर हरेक को भौंकने और काटने लगता है, इसी प्रकार जब क्रोध प्रविष्ट होता है तो व्यक्ति अपना मुंह खोल लेता है तथा विवेकमयी आंखें बंद कर लेता है।
































