स्वाध्याय से ज्ञान बढ़ता है – मुनि पीयूष
करनाल, आशुतोष गौतम। उपप्रवर्तक श्री पीयूष मुनि जी महाराज ने श्री आत्म मनोहर जैन आराधना मंदिर करनाल से अपने दैनिक संदेश में कहा कि जीवन में ज्ञान की प्राप्ति के लिए जहाँ सत्संग महत्त्वपूर्ण उपाय है, वहाँ स्वाध्याय का भी कम महत्त्व नहीं है। अंतर दोनों में इतना है कि सत्संग का सहारा साधारण जनमानस भी ले सकता है परन्तु स्वाध्याय करने के लिए शिक्षित, पढ़ा-लिखा तथा उस भाषा का जानकर होना आवश्यक होता है। महापुरुषों के अनुभवपूर्ण सूक्तों का संगम शास्त्र कहा जाता है। ऐसे ज्ञानवर्धक साहित्य को पढ़ने से निश्चित रूप से अध्ययन करने वाले का ज्ञान बढ़ता है। ज्यों-ज्यों ज्ञान पर आवरण डालने वाले कर्म के बंधन कमजोर होते है, त्यों-त्यों आत्मा उजली और पवित्र होती जाती है। आत्मा का छोड़ने योग्य तथा ग्रहण करने योग्य तत्त्व को जानना ज्ञान है। स्वाध्याय से ज्ञान पर पड़े पर्दे कमजोर हो कर उघड़ने लगते हैं। योग्य, विद्वान तथा अनुभवी गुरु के चरणों मे बैठ कर पढ़ने से पाठ की विशुद्धि होती है, अहं दूर होता है। जीवन में कृतज्ञता की भावना आने से अनेक दुर्गुण दूर होते है। गुरु से पढ़ते समय मन में आने वाली शंकाओं का निराकरण करने के लिए सद्भावनापूर्वक प्रश्न पूछा जाता है। गुरु की योग्यता की परीक्षा नहीं बल्कि अपनी शंका के निवारण और ज्ञान को बढ़ाने के लिए प्रश्न किया जाता है। बार-बार दोहराने से पढ़ा हुआ ज्ञान स्मृति में स्थाई रूप से अंकित हो जाता है। विषय पर चिन्तन करने से वह गहराई तक भीतर उतरता चला जाता है और भावना पवित्र होकर मन निर्मल हो जाता है। जैसे धन से धन बढ़ता है, वैसे ही ज्ञान से ज्ञान में बढ़ोतरी होती रहती है। मुनि जी ने कहा कि धर्मकथा स्वाध्याय का एक अंग है परन्तु चरित्रवान व्यक्ति ही स्वाध्याय के इस अंग का आचरण कर सकता है। यह सार्वजनिक रूप से किया जाता है जबकि स्वाध्याय के बाकी चारों अंग नितान्त एकान्तिक और वैयकितक है तथा वे धर्मकथा की भूमिका तैयार करते हैं। धर्मकथा का प्रभाव तात्कालिक और व्यापक है। थोड़े लोगों को अच्छी बातें सुनाकर सन्मार्ग पर चलाना ही धर्मकथा है। कभी-कभी कुछ लोग विद्वान होते हुए भी अपने विचारों को अच्छी तरह से व्यक्त कर पाने में असमर्थ होते हैं। अच्छा वक्ता होने के लिए स्वाध्याय के द्वारा अपने विषय का विस्तृत ज्ञान प्राप्त करके अपने ज्ञान के कोष को समृद्ध बनाना जरूरी है। तत्त्व का ज्ञान प्राप्त करने के लिए ज्ञानी पुरुषों के चरणों में विनम्रतापूर्वक नमस्कार करना, सेवा करना तथा सफलतापूर्वक प्रश्न पूछना जरूरी है। ज्ञान लोक तथा परलोक दोनों में साथ देता है। ज्ञान के समान कोई दूसरा पवित्र पदार्थ संसार में नहीं है। शुद्ध अन्त:करण के द्वारा अपनी आत्मा में ज्ञान पाया जा सकता है।
































