काम-भोग सारे अनर्थों की खान हैं : मुनि पीयूष
करनाल, आशुतोष गौतम ( 25 मई ) उपप्रवर्तक श्री पीयूष मुनि जी ने श्री आत्म मनोहर जैन आराधना मन्दिर से अपने दैनिक सन्देश में कहा कि इस सृष्टि में अपने जीवन काल में यूं तो सभी मनुष्य जीते हैं परंतु उनमें से बहुत थोड़े व्यक्ति जीवन को उन्नत बनाकर सफल बना पाते हैं। वास्तव में बहुत ही कम अर्थात गिने-चुने लोग ही जीवन की वास्तविक सफलता की और ध्यान देते हैं। हालांकि प्रत्येक मनुष्य बाजार से पाँच रुपये की वस्तु खरीदने पर उसका सदा सही उपयोग करने का विचार करता है परंतु अमूल्य जीवन की उपयोगिता पर विचार करने का कष्ट नहीं उठाता। कुछ व्यक्ति जो इस विषय में विचार करते भी हैं, उनकी दृष्टि अत्यंत सीमित होती है। अत: वे इहलौकिक सफलता की दृष्टि से विचार करते हैं। आत्मा के कल्याण का कोई दृष्टिकोण उनके सामने नहीं रहता। कुछ करोड़पति-अरबपति बनने में जीवन की सफलता मानते हैं, कुछ मान-प्रतिष्ठा की प्राप्ति में, कुछ सपन्न परिवार बनाने में, कुछ भोग-उपभोग में तथा कुछ परिवार की वृद्धि में कामयाबी मानते हैं। उनकी दृष्टि में शरीर का सुख मुय होता है तथा शरीर में स्थित आत्मा का सुख नगण्य। दूसरे शब्दों में वे शरीर तथा आत्मा को भिन्न तत्त्व नहीं मानते परंतु जिस शारीरिक सुख और भोग-विलास को मनुष्य जीवन का चरम सुखकर मान उसकी प्राप्ति में लगा रहता है, उससे आत्मा की समस्या नहीं सुलझती और आत्मा बंधनमुक्त नहीं होती। ये काम-भोग क्षण भर के लिए सुख देने वाले तथा चिरकाल पर्यन्त दुखप्रदायक हैं। ये काम-भोग, जन्म-मरण से छुटकारा पाने के घोर विरोधी, मोक्ष सुख के शत्रु तथा सारे अनर्थों की खान हैं। मुनि जी ने कहा कि जिसे आत्म तत्त्व की स्वतन्त्र सत्ता की प्रतीति हो चुकी है, ऐसा विवेकवान व्यक्ति मानव शरीर का निमित्त पाकर जीवन को सार्थक तथा उन्नत करने का प्रयत्न करता है। आत्मा की उन्नति तथा उसके कल्याण का अभिप्राय है। आत्मा के विशुद्ध स्वरूप की प्राप्ति करना। विषय-विकारों को जीतते हुए आत्मा को निर्विकार करने का प्रयत्न करना ही आत्मा की उन्नति है। ज्यों-ज्यों आत्मा उन्नत होती जाती है, मुक्ति उतनी निकट आती जाती है। प्रत्येक बुद्धिमान को प्रतिक्षण आत्मोन्नति करते हुए जीवन को उन्नत बनाना चाहिए। आत्मा को ऊंचा उठाने के लिए सर्वप्रथम आत्मविश्वास आवश्यक है। आत्मविश्वास का अर्थ है आत्मा की असीम तथा अनन्त शक्ति पर विश्वास करना। परमात्मा में जो शक्तियां मानी जाती हैं, उन सबका अपनी आत्मा में अनुभव करना। समग्र पारमात्मिक शक्तियां मेरी आत्मा में विद्यमान हैं, इस प्रकार की प्रबल अनुभूति से आत्मा में तत्काल अपूर्व बल का उदय होता है। इसके विपरीत आत्महीनता मृत्यु के समान दुखदाई है। आत्महीनता एक ऐसी मौत है जो पल-पल करके आती है और तिल-तिल कर के आन्तरिक शांति को जलाती रहती है। अत: आत्मबल की अनुभूति के द्वारा बुद्धिमान व्यक्ति को आत्मविश्वास पैदा करना चाहिए। आत्मबल के बिना मानव उन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ नहीं सकता आत्मबल के द्वारा मनुष्य निर्भय होकर उन्नति के रास्ते पर आगे बढ़ता है। आत्मबल बढऩे से इन्द्रियों की प्रबलता घटती है। विषयों से आसक्ति हटने लग जाती है। आत्मा में अपूर्व बल, शांति, संतुष्टि उत्पन्न होते हैं तथा इस प्रकार आत्मा का उत्थान होने लगता है। मुनि जी ने विशेषरूप से कहा कि जिस व्यक्ति में उद्यम, पुरुषार्थ, साहस, धैर्य, बल, बुद्धि तथा पराक्रम हैं उसका आत्मिक बल इतना बढ़ जाता है कि देवता भी उससे शंकित रहते हैं। उन्नति के इच्छुक व्यक्ति को उद्यमी होना चाहिए। सही चिंतन और उसके अनुसार सही कार्य उन्नति के दो चरण हैं, जिनके बराबर चलते रहने पर ही तरक्की सभव है। किसी लालच, भय अथवा प्रलोभन से अपनी गति को न रोकते हुए जो उद्यमी व्यक्ति अपने निश्चित लक्ष्य की ओर बिना रुके बढ़ जाता है वही उसे पाने में सफल होता है। बिना मेहनत के सफलता नहीं मिलती। काम मेहनत से ही बनते है, मनोरथ करने मात्र से नहीं। सोए हुए शेर के मुंह में हिरण अपने आप प्रवेश नहीं करते। इसलिए अगर आगे बढ़ना है तो अपना रास्ता खुद बनाइए।

































