दुर्जन अपना तथा दूसरों का भला नहीं करता : मुनि पीयूष
करनाल, आशुतोष गौतम ( 25 जून ) उपप्रवर्तक श्री पीयूष मुनि जी महाराज ने श्री आत्म मनोहर जैन आराधना मंदिर से अपने दैनिक संदेश में कहा कि कुछ व्यक्ति सामाजिक दृष्टि से हीन स्थितियों में जन्म लेकर अपने विचारों, वाणी तथा कर्मों से भी हीन बने रहते हैं। ऐसे व्यक्ति जिंदगी भर तुच्छ बने रहते हैं और सुधरने का नाम नहीं लेते। कोई भी गुरु, कैसा भी उपदेश तथा अच्छे से अच्छा वातावरण भी उनके हृदय को बदल नहीं सकता। जिस प्रकार विषधर सांप चन्दन के पेड़ पर रहकर भी जहर से रहित नहीं होता, उसी प्रकार नीच व्यक्ति सज्जनों के साथ जीवन व्यतीत करते हुए भी अपनी नीचता नहीं छोड़ता। दुर्जन व्यक्ति न तो अपना भला कर सकता है और न ही दूसरों का। इस लोक में वह सदा दूसरों का अनिष्ट करता है तथा परलोक में भी महान दुख और कष्ट उठाता है। इसीलिए बुद्धिमान व्यक्ति कहते हैं कि दुष्ट लोगों से कभी भी मैत्री नहीं करनी चाहिए। दुष्ट व्यक्ति दुश्मन होने पर तो अहित करता ही है, परन्तु वह मित्र बनकर भी अनिष्टकारी ही बनता है। दुर्जन के साथ न मैत्री और न ही वैर करना चाहिए। वह प्रत्येक स्थिति में दुख का कारण बनता है। कोयला अगर जलता हुआ हो तो वह छूते ही जला देता है तथा ठण्डा हो तो हाथ तथा कपड़े काले कर देता है। दुष्टों की संगति से बचने के लिए विवेकी पुरुष कहते हैं कि विधाता भले ही नरक में भेज दें परन्तु दुष्टों के साथ स्वर्ग में भी नहीं रहा जा सकता। मुनि जी ने कहा कि अपने जीवन को महान तथा समुन्नत बनाने के लिए जन्म से उच्च, कुलीन अथवा ऐश्वर्यसम्पन्न होना आवश्यक नहीं है बल्कि अपने विचारों, बोल-चाल तथा कर्मों से ऊंचा होना चाहिए। हृदय में विकारों का न होना तथा उसका शुद्ध और पवित्र होना महानता का लक्षण है। मनुष्य उतना ही महान होगा जितना उसमें सत्य, त्याग, वैराग्य, प्रेम तथा क्षमा की भावना का विकास होगा। जिसकी आसक्ति नष्ट हो गई है, जिसका अज्ञान मिट गया है तथा जो परमात्म तत्त्व में स्थिर है वही अपनी आत्मा का कल्याण कर सकता है। इसलिए अगर व्यक्ति अपने जीवन को महान और अपनी आत्मा को परमात्मा बनाना चाहता है तो अपने मन को शुद्ध, वाणी को संयत और विवेकमयी तथा कर्मों को अपने तथा दूसरों के लिए कल्याणकारी बनाने का प्रयत्न करना चाहिए। वही आत्मा के अभ्युदय तथा निश्रेयस का रास्ता है। मानव जीवन केवल इच्छानुसार भोजन करने, लम्बी तानकर सोने तथा भोग-विलास का सेवन करने के लिए नहीं मिला बल्कि अपना कल्याण करना और आवागमन के जंजाल से छूटना ही इसकी सफलता का रहस्य है। अपनी आवश्यकताएं पूरी करना, परिवार की जरूरतों की पूर्ति कर अपना फर्ज निभाना पर्याप्त नहीं है बल्कि सारे कर्मों को काटकर मुक्ति पाना ही जीवन का सर्वोच्च ध्येय है।






























